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5 सालों से सरकारी मदद की आस में भटक रहा गोलियों से घायल यह जवान, पढ़ें इनकी कहानी

Publish Date:Sat, 24 Mar 2018 09:56 AM (IST)

जय जवान: नक्सली हमले में हुआ था घायल, बेहतर इलाज के लिए मदद की दरकार


मुरैना (शिवप्रताप सिंह जादौन)। मुरैना, मध्यप्रदेश के तरसमा गांव निवासी सीआरपीएफ जवान मनोज तोमर की जिंदगी मौत से भी बदतर हो गई है। मार्च 2014 में छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में नक्सली मुठभेड़ में वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पेट में सात गोलियां लगीं, जान बच गई, लेकिन बेहतर इलाज के अभाव में मनोज पेट से बाहर निकली आंत को पॉलीथिन में लपेटकर जीवन बिताने को मजबूर हैं।

गंभीर घायल होने की स्थिति में आंत को पेट में रखने का ऑपरेशन उस समय संभव नहीं था, इसलिए आंत का कुछ हिस्सा बाहर ही रह गया। अब इसका इलाज संभव है, लेकिन पैसों की कमी आड़े आ रही है। यही नहीं, गोली लगने से उनकी एक आंख की रोशनी भी जा चुकी है।

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नियमों से है शिकायत

मनोज के मुताबिक उनकी शिकायत सीआरपीएफ से नहीं है बल्कि सरकार के नियमों से है। नियम कहता है कि वे छत्तीसगढ़ में ड्यूटी के दौरान जख्मी हुए थे इसलिए उनका उपचार अनुबंधित रायपुर के नारायणा अस्पताल में ही होगा, जबकि वहां पूर्ण इलाज संभव नहीं है। सरकार एम्स में आंत के ऑपरेशन और चेन्नई में आंख के ऑपरेशन का इंतजाम करवा सकती है, जो नहीं हो रहा है। मनोज नारायणा अस्पताल रायपुर में नियमित चेकअप के लिए जाते हैं, इसमें भी उन्हें परेशानी उठाना पड़ती है।




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आश्वासन मिला, मदद नहीं

लगातार आठ साल तक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुरक्षा दल में भी रह चुके मनोज को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से पांच लाख रुपये की सहायता का आश्वासन भी मिला, लेकिन मदद आज तक नहीं मिल पाई। विशेषज्ञों द्वारा ऑपरेशन किए जाने के बाद मनोज की आंत पेट में रखी जा सकती है और तब वे सामान्य जिंदगी जी सकते हैं। आंख की रोशनी भी लौट सकती है, लेकिन दोनों के इलाज का संभावित खर्च पांच से सात लाख रुपए है। इसकी व्यवस्था निजी स्तर पर कर पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है।

इकलौते बचे थे उस हमले में...




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मनोज 11 मार्च 2014 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के दोरनापाल थाना क्षेत्र में थे। घटना वाले दिन सुबह आठ बजे वे टीम के साथ सर्चिंग के लिए झीरम घाटी की ओर निकले थे। तभी घात लगाए 300 से ज्यादा नक्सलियों ने उनकी टीम पर फायरिंग शुरू कर दी। हमले में 11 जवान शहीद हो गए। सिर्फ मनोज ही हमले में बच सके।



चौंक गए थे गृह मंत्री राजनाथ

मनोज के मुताबिक वे दो साल पहले किसी तरह केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिले। सिंह ने जब उनके पेट से बंधी पॉलीथिन में रखी आंतों को देखा तो चौंक गए। मनोज के मुताबिक गृह मंत्री ने उनसे कहा था कि वे अपनी सांसद निधि से पांच लाख रुपए का चेक देंगे। अभी तक मदद नहीं मिली है। मनोज के मुताबिक वे केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से भी मिले, जिनकी सिफारिश के बावजूद एम्स में इलाज नहीं हो सका।

जब आंतें जुड़ने की स्थिति में नहीं होती हैं तो अस्थाई रूप से कोलोस्टॉमी बना दी जाती है। संक्रमण रोकने के लिए मरीज को एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करना होता है।

-डॉ. सुनील अग्रवाल, एसोसिएट प्रोफेसर (सर्जरी), गजराराजा
मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर


उपचार सीआरपीएफ के लिए मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर संबंधित राज्य के अनुबंधित अस्पताल में किया जाता है। यही नियम है।

-सत्येंद्र सिंह, इंचार्ज पीआरओ,सीआरपीएफ मुख्यालय, दिल्ली



By Sanjay Pokhriyal
 

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This will force the attention of public and get the jawan necessary help.
 

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This will force the attention of public and get the jawan necessary help.
This news is doing rounds in mainstream media, but does he have to go around meeting netas is this why we voted for modi to see our jawans in this condition?
 

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Guys, good news, surgery sccessful at AIIMS:balleballe:

पॉलिथीन में आंत लेकर घूमने वाले जवान की हुई एम्स में सफल सर्जरी

Publish Date:Sat, 31 Mar 2018 02:01 PM (IST)

एम्स ट्रॉमा सेंटर में चिकित्सकों ने सर्जरी कर उनकी बाहर निकली आंत को वापस शरीर में यथास्थान लगा दिया। एम्स ट्रॉमा सेंटर के अनुसार उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है।


नई दिल्ली/ग्वालियर [ जेएनएन ]। नक्सली हमले में घायल होने के बाद चार साल तक समुचित इलाज के अभाव में आंत का एक हिस्सा पेट के बाहर लेकर भटकने को विवश रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवान मनोज तोमर को आखिरकार असहनीय पीड़ा से राहत मिल गई।

शुक्रवार को एम्स ट्रॉमा सेंटर में चिकित्सकों ने सर्जरी कर उनकी बाहर निकली आंत को वापस शरीर में यथास्थान लगा दिया। एम्स ट्रॉमा सेंटर के अनुसार उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। एम्स के चिकित्सकों ने मनोज की सर्जरी को आसान प्रक्रिया बताया है। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी सर्जरी जटिल नहीं थी फिर भी हैरानी की बात है कि वह पिछले चार साल से आंत का यह हिस्सा पॉलीथिन में लेकर घूमने को मजबूर थे।



हालांकि अब इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। डॉक्टरों को उम्मीद है कि वह सामान्य जीवन व्यतीत कर सकेंगे। 'नईदुनिया" ने 'पॉलीथिन में आंत रख भटक रहा सात गोलियां झेलने वाला जवान" खबर प्रकाशित कर मनोज तोमर की व्यथा को देश के सामने रखा था। इसके बाद मप्र सरकार ने 10 लाख की सहायता राशि की घोषणा की और सीआरपीएफ ने समुचित इलाज की प्रतिबद्धता जताई।




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सीआरपीएफ अधिकारियों की देखरेख में उन्हें इलाज के लिए मप्र से एसी एंबुलेंस में दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया था। मप्र सरकार के अधिकारी व डॉक्टर भी साथ पहुंचे थे। गुरुवार को मनोज की सर्जरी की जानी थी लेकिन कुछ कारण से सर्जरी टाल दी गई थी। इसके बाद शुक्रवार को करीब ढाई घंटे उनकी सर्जरी चली।

रायपुर में हुए इलाज पर उठे सवाल

ट्रॉमा सर्जरी के डॉक्टरों ने उनकी सर्जरी की। सीआरपीएफ जवान की एम्स में हुई सफल सर्जरी, आंतें की अंदर रायपुर में हुए इलाज पर उठे सवाल एम्स के चिकित्सकों ने बताया कि मनोज की आंत का बाहर निकला हुआ हिस्सा बिल्कुल ठीक था। पेट खोलकर उसे अंदर अपनी जगह पर बैठा दिया गया है। लेकिन यह काम चार साल तक क्यों नहीं हो सका, इस पर उन्होंने यह कह कर आश्चर्य जताया कि यह कोई जटिल सर्जरी नहीं थी।




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मनोज ने बताया था कि रायपुर, छत्तीसगढ़ में उनके तीन ऑपरेशन असफल रहे थे। वर्ष 2014 में नक्सली हमले में सात गोलियां लगने के बाद की गई सर्जरी के दौरान यह आंत बाहर रखी गई थी। एम्स के चिकित्सकों ने कहा कि तब मल निकासी के लिए कोलोस्टोमी सर्जरी की गई थी, जिसके तहत यह आंत पेट के बाहर रखी गई। जवान की यह कोलोस्टोमी सर्जरी नहीं की जानी चाहिए थी। चिकित्सकों ने कहा- सर्जरी जटिल नहीं थी, इतने साल क्यों लगे
 

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