The Book Recommendation Thread

Discussion in 'General Multimedia' started by OneGrimPilgrim, Aug 18, 2016.

  1. OneGrimPilgrim

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    whr invaders hv been eulogised, heroes binned!!
    Hello all,

    got the idea to create this thread some days back. I'd suggest a format of posting a book-recommendation here as:

    <TITLE>

    <CATEGORY/GENRE>

    <GIST/SUMMARY/ANY HIGHLIGHTS>

    <LINK TO PURCHASE-SITE OR SOURCE> (could be embedded in the title itself too)

    <ANY COMMENT(S)>

    will start with my recommendation...




     
  2.  
  3. OneGrimPilgrim

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    DURBAR

    [​IMG]

    Category: Indian Politics/political history

    Gist:
    Durbar is a first-person account of some of the most impactful incidents that took place at the hands of the Central Government. It begins with an account of the Emergency in 1975, when the author began her career as a junior reporter with The Statesman, and moves on to chronicle the instabilities of the times that followed.

    The Emergency was a landmark event that set the course of the spiral of incidents that followed it: Indira Gandhi’s assassination followed by Rajiv Gandhi’s ascent to power, a period fraught with struggles and turbulence in the government. He was accused of following nepotism in the corridors of power, and was associated with many controversies such as the the anti-Sikh riots, the Bhopal Gas tragedy and the Bofors scam, which served to tarnish the impeccable image of the Congress in the days to come.

    Durbar provides a vivid detailing of an insider’s account of some of the most troubled times our country has been through and is, in a sense, a compelling history of our past.

    It was published in the year 2013 by Hachette India and is available in paperback.

    Key Features:

    • The book is an interesting chronicle of some of the most monumental events in India’s past.
    • It is authored by someone who has been closely involved with some of the most authoritative leaders in the corridors of power.

    Comments: thanks to @Berkut for recommending this. its a tough-to-put-down book. have gone through only initial 30-40 pages. very interesting read.
     
  4. OneGrimPilgrim

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    Desh Ki Hatya (Hindi)

    [​IMG]

    Category: fiction/political novel (from the 60s), based on real Indian political events

    Gist:

    सम्पादकीय

    उपन्यासकार गुरुदत्त का जन्म जिस काल और जिस प्रदेश में हुआ उस काल में भारत के राजनीतिक क्षितिज पर बहुत कुछ विचित्र घटनाएँ घटित होती रही हैं। गुरुदत्त जी इसके प्रत्यक्षदृष्टा ही नहीं रहे अपितु यथासमय वे उसमें लिप्त भी रहे हैं। जिन लोगों ने उनके प्रथम दो उपन्यास ‘स्वाधीनता के पथ पर’ और ‘पथिक’ को पढ़ने के उपरान्त उसी श्रृंखला के उसके बाद के उपन्यासों को पढ़ा है उनमें अधिकांश ने यह मत व्यक्त किया है कि उपन्यासकार आरम्भ में गांधीवादी था, किंतु शनैः-शनैः वह गांधीवादी से निराश होकर हिन्दुत्ववादी हो गया है।

    जिस प्रकार लेखक का अपना दृष्टिकोण होता है उसी प्रकार पाठक और समीक्षक का भी अपना दृष्टिकोण होता है। पाठक अथवा समीक्षक अपने दृष्टिकोण से उपन्यासकार की कृतियों की समीक्षा करता है। उनमें कितना यथार्थ होता है, यह विचार करने की बात है। इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि व्यक्ति की विचाधारा का क्रमशः विकास होता रहता है। यदि हमारे उपन्यासकार गुरुदत्त के विचारों में विकास हुआ तो वह प्रगतिशीलता का ही लक्षण है। किन्तु हम उन पाठकों और समीक्षकों के इस मत से सहमत नहीं कि आरम्भ का गांधीवादी गुरुदत्त कालान्तर में गांधी-विरोधी रचनाएँ लिखने लगा। इस दृष्टि से गुरुदत्त की विचारधारा में कहीं भी परिवर्तन नहीं दिखाई दिया गांधी के विषय में जो धारणा उपन्यास ने अपने प्रारम्भिक उपन्यासों में व्यक्त की है, क्रमशः उसकी पुष्टि ही वह अपने अवान्तरकालीन उपन्यासों में करता रहा है।
    जैसा कि हमने कहा है कि गुरुदत्त प्रत्यक्षदृष्टा रहे हैं। उन्होंने सन् 1921 के असहयोग आन्दोलन से लेकर सन् 1948 में महात्मा गांधी की हत्या तक की परिस्थितियों का साक्षात् अध्ययन किया है। उस काल के सभी प्रकार के संघर्षों को न केवल उन्होंने अपनी आँखों से देखा है अपितु अंग्रेजों के दमनचक्र, अत्याचारों और अनीतिपूर्ण आचरण को स्वयं गर्मदल के सदस्य के रुप में अनुभव भी किया है। अतः लेखक ने घटनाओं के तारतम्य का निष्पक्ष चित्रण करते हुए पाठक पर उसके स्वाभाविक प्रभाव तथा अपने मन की प्रतिक्रियाओं का अंकन किया है। ‘स्वाधीनता के पथ पर’, ‘पथिक’, ‘स्वराज्यदान’, ‘दासता के नये रूप’, ‘विश्वासघात और ‘देश की हत्या’ को जो पाठक पढ़ेगा उसको यह सब स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।

    श्री गुरुदत्त के उपन्यासों को पढ़कर उनका पाठक यह सहज ही अनुमान लगा लेता है कि राजनीति के क्षेत्र में वे राष्ट्रीय विचारधारा के लेखक हैं। सच्चे राष्ट्रवादी की भाँति वे देश के कल्याण की इच्छा और इस मार्ग से चलते विघ्न-संतोषियों पर रोष व्यक्त करते हैं। लेखक के राष्ट्रीय विचारों को ईर्ष्यावश साम्प्रदायिक कहने वाले सम्भवतया यह भूल जाते हैं कि उनके किसी भी उपन्यास में कहीं भी किसी सम्प्रदाय विशेष की उन्नति या उत्तमता की चर्चा तथा अन्य सम्प्रदायों का विरोध नहीं किया गया है। हाँ, इसमें कोई सन्देह नहीं कि अपनी कृतियों में वे स्थान-स्थान पर राष्ट्रवादियों के लिए हिन्दुस्तानी अथवा भारतीय अथवा ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग करते हैं। यह सम्भव है कि भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार, विशेषतया कांग्रेसी और कम्युनिस्ट ‘हिन्दू’ शब्द को इसलिए साम्प्रदायिक मानते हों कि कहीं इससे मुसलमान रुष्ट न हो जाएँ। वास्तव में हमारा लेखक तो हिन्दुत्व और भारतीयता को सदा पर्यायवाची ही मानता आया है।

    इसके साथ ही इस उपन्यास में कांग्रेसी नेताओं और कांग्रेस सरकार के कृत्यों पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है। यह सब प्रसंगवशात् नहीं अपितु कथानक की माँग को देखकर यह विशद वर्णन स्वाभाविक ही था। इस काल पर जितने भी उपन्यास लिखे गये हैं, लेखक के दृष्टिकोण में अन्तर होने के कारण नेताओं तथा दल की राजनीति पर भी विभिन्न प्रकार की आलोचना हुई हो किन्तु निष्पक्ष लेखक अथवा उपन्यासकार तथ्यों की अनदेखी नहीं कर सकता। यही गुरुदत्त जी ने अपने इस उपन्यास में किया है।

    भूमिका

    ‘देश की हत्या’ 1947 में जो देश-विभाजन हुआ, उसकी पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है। इस प्रकार भारतवर्ष में गांधी-युग की पृष्ठभूमि पर लिखे अपने उपन्यासों की श्रृंखला में यह अन्तिम कड़ी है। ‘स्वाधीनता के पथ पर’, ‘पथिक’, ‘स्वराज्य-दान’ और ‘विश्वासघात’ पहले ही पाठकों के सम्मुख आ चुके हैं। उसी क्रम में इस उपन्यास को लिखकर देश के इतिहास को इस युग के अन्त तक लिख दिया गया है।
    इन उपन्यासों में उस युग की सम्पूर्ण घटनाओं को नहीं लिखा जा सका। फिर भी, जो-जो ऐतिहासिक तथ्य लिखे हैं, वे सब सत्य हैं। तत्कालीन इतिहास के साथ-साथ ही ये उपन्यास चलते हैं। उपन्यास विवेचनात्मक हैं और विवेचना अपनी है। कोई अन्य व्यक्ति इन्हीं ऐतिहासिक घटनाओं के अर्थ भिन्न ढंग से भी लगा सकता है। इन अर्थों का विश्लेषण पाठक स्वयं करने का यत्न करें, तो ठीक रहेगा।

    इन सब उपन्यासों को क्रमानुसार पढ़ने से कुछ पाठकों को ऐसा भास हुआ है कि लेखक के विचार बदल गए हैं। इस कारण ‘स्वाधीनता के पथ पर’ के गांधीवाद का प्रशंसक ‘देश की हत्या’ में गांधीवाद का निन्दक हो गया प्रतीत होता है। किन्तु ऐसा नहीं है। लेखक ने इतिहास के तारतम्य को ज्यों-का-त्यों रखते हुए, उसके जनता पर प्रभाव को निष्पक्ष भाव से अंकित करते हुए अपने मन पर उत्पन्न हुए भावों को भी लिखा है। यह यत्न किया गया है कि गांधीवाद के समर्थकों का दृष्टिकोण भी यथासम्भव रख दिया जाए। अतएव विचारों में विषमता भासित हो सकती है; वास्तव में ऐसा नहीं है।

    राष्ट्र किसी देश के उन नागरिकों के समूह को कहते हैं, जो देश के हित में अपना हित समझते हैं। कभी-कभी देश में ऐसा समूह बहुत छोटा रह जाता है। वे लोग, जो अपने निजी स्वार्थ को सर्वोपरि मानते हैं, बहुत भारी संख्या में उत्पन्न हो जाते हैं, तब देश को हानि पहुँचती है और देश पराधीनता की श्रृंखलाओं में बँध जाता है। राष्ट्र की उन्नति अर्थात् देश में ऐसे लोगों की संख्या में वृद्धि होना, जो देश के सामूहिक हित को व्यक्ति के हितों से ऊपर समझते हैं, अत्यावश्यक है। इसी देश में सुख-शान्ति, ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती है।

    महात्मा गांधी जी की हिन्दू-मुस्लिम एकता की विधि दूषित थी और उक्त लक्ष्य के विरुद्ध बैठी थी। उसका परिणाम 1946-47 के प्रचण्ड हत्याकाण्डों में प्रकट हुआ और अन्त में देश-विभाजन हुआ, जिसके दुःखद परिणाम होने की सम्भावना तब तक बनी रहेगी, जब तक यह विभाजन स्थिर रहेगा। जब-जब भी देश का द्वार गांधार तथा कामभोज (सिन्धु पार का सीमा प्रदेश और अफगानिस्तान) देश के हितेच्छुओं के हाथ में रहा है, तब ही देश सुरक्षित और शान्तिमय रह सका है। जिस राजा अथवा सम्राट ने इस तथ्य को समझा है, उसे अपना अधिकार दो प्रदेशों पर रखने का यत्न किया है। 1919 से 1947 तक की कांग्रेस-नीति ने दोनों प्रदेश भारत के हित के विपरीत जाति के हाथों में दे दिए हैं। उसी नीति से अब कश्मीर को उन लोगों के हाथों में देने का प्रयोजन किया जा रहा है, जो देश के हित का चिन्तन भी नहीं कर सकते। इस दूषित नीति का स्पष्टीकरण ही ‘विश्वासघात’ और ‘देश की हत्या’ में करने का यत्न किया गया है।

    यह सम्भव है कि जनता के कुछ लोग लेखक के परिणामों को स्वीकर न करते हों। इसी कारण इन पुस्तकों का लिखना आवश्यक हो गया है। स्वराज्य-प्राप्ति के पश्चात् भारत के शासक-दल ने घटनाओं को विकृत करने, उन घटनाओं में अपने उत्तरदायित्व को दूसरों के गले मढ़ने और घटनाओं को छिपाने का यत्न आरम्भ कर दिया है, इस कारण भी यह दूसरा दृष्टिकोण उपस्थित करना आवश्यक हो गया है।

    देश-विभाजन ठीक नहीं माना जा सकता। परन्तु यह क्यों हुआ, किसने किया और कैसे इसको मिटाया जा सकता है ? ये प्रश्न देश के सम्मुख हैं और तब तक रहेंगे, जब तक यह मिट नहीं जाता। सामयिक चिन्ताओं में ग्रस्त लोग भले ही नाक की नोक के आगे न देख सकें, परन्तु दूर-दृष्टि रखने वाले तो इन प्रश्नों पर विचार करेंगे ही। उनको रोकना असम्भव है।
    1947 की भयंकर घटनाओं की पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास ऐतिहासिक व्यक्तियों तथा तथ्यों को छोड़, मुख्यतया काल्पनिक ही है। इसके लिए घटनाओं का ज्ञान अनेकानेक निर्वासित भाइयों के वक्तव्यों, समय के समाचार-पत्रों तथा श्री गोपालदास की खोसला की ‘स्टर्न रैकनिंग’ और श्री अमरनाथ बाली की ‘नो इट कैन बी टोल्ड’ नामक अंग्रेजी की पुस्तकों के आधार पर संचित किया गया है।
    तदपि है तो यह उपन्यास ही।

    more here: http://pustak.org/index.php/books/bookdetails/5339

    Comment: this was recently recommended to me by my father. on my to-read list.
     
  5. Berkut

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    @OneGrimPilgrim, I'm not getting any updates when you are communicating with me or tagging me.

    To all the fellow travellers please check out:
    "Open Secrets by M.K.Dhar" - excellent insights into the workings of the intelligence bureau.
    "Courage and Conviction" by Gen. V.k. Singh.... Excellent account of the corruption the top echleons of the forces used to face
     
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  6. mayfair

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    Highly recommended by Hakimji ala Shiv, the well respected poster on BRF as the best introduction to Sanatan Dharm that he's read.

    [​IMG]
     
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  7. mayfair

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    1962: The War That Wasn't
    by Shiv Kunal Verma

    On 20 October 1962, high in the Himalayas on the banks of the fast-flowing Nam Ka Chu, over 400 Indian soldiers were massacred and the valley was overrun by soldiers of China’s People’s Liberation Army. Over the course of the next month, nearly 4,000 soldiers were killed on both sides and the Indian Army experienced its worst defeat ever. The conflict (war was never formally declared) ended because China announced a unilateral ceasefire on 21 November and halted its hitherto unhindered advance across NEFA and Ladakh. To add to India’s lasting shame, neither Prime Minister Jawaharlal Nehru nor the Indian Army was even aware that the ‘war’ had ended until they heard the announcement on the radio—despite the Indian embassy having been given the information two days earlier. This conflict continues to be one of our least understood episodes. Many books have been written on the events of the time, usually by those who were involved in some way, anxious to provide justification for their actions. These accounts have only succeeded in muddying the picture further. What is clear is that 1962 was an unmitigated disaster. The terrain on which most of the battles were fought (or not fought) was remote and inaccessible; the troops were sorely underequipped, lacking even warm clothing; and the men and officers who tried to make a stand were repeatedly let down by their political and military superiors. Time and again, in Nam Ka Chu, Bum-la, Tawang, Se-la, Thembang, Bomdila—all in the Kameng Frontier Division of NEFA in the Eastern Sector—and in Ladakh and Chusul in the Western Sector, our forces were mismanaged, misdirected or left to fend for themselves. If the Chinese Army hadn’t decided to stop its victorious campaign, the damage would have been far worse.In this definitive account of the conflict, based on dozens of interviews with soldiers and numerous others who had a first-hand view of what actually happened in 1962, Shiv Kunal Verma takes us on an uncomfortable journey through one of the most disastrous episodes of independent India’s history.
     
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  8. mayfair

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    The Wishing Tree: Presence and Promise of India Hardcover – 2015
    by Subhash Kak (Author)
    Hardcover: 233 pages
    Publisher: Aditya Prakashan (2015)
    Language: English
    ISBN-10: 8177421530
    ISBN-13: 978-8177421538

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    Subhash Kak is a widely known scientist and Vedic scholar. Currently a professor at Louisiana State University, he has authored ten books and more than 200 research papers in the fields of information theory, quantam mechanics, and Indic studies.
     
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